ग़ज़ल
उसका अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है यूँ है
उसका अपना ही करिश्मा है फ़सूँ है, यूँ हैयूँ तो कहने को सभी कहते है, यूँ है, यूँ है
जैसे कोई दर-ए-दिल हो पर सिताज़ा कब सेएक साया न दरू है न बरू है, यूँ है,
तुमने देखी ही नहीं दश्त-ए-वफा की तस्वीरचले हर खार पे कि कतरा-ए-खूँ है, यूँ है
अब तुम आए हो मेरी जान तमाशा करनेअब तो दरिया में तलातुम न सकूँ है, यूँ है
नासेहा तुझको खबर क्या कि मुहब्बत क्या हैरोज़ आ जाता है समझाता है, यूँ है, यूँ है
शाइरी ताज़ा ज़मानो की है मामर 'फ़राज़'ये भी एक सिलसिला कुन्फ़े क्यूँ है, यूँ है, यूँ है
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