ग़ज़ल
कुछ न किसी से बोलेंगे
कुछ न किसी से बोलेंगेतन्हाई में रो लेंगे
हम बेरहबरों का क्यासाथ किसी के हो लेंगे
ख़ुद तो हुए रुसवा लेकिनतेरे भेद न खोलेंगे
जीवन ज़हर भरा साग़रकब तक अमृत घोलेंगे
नींद तो क्या आयेगी "फ़राज़"मौत आई तो सो लेंगे
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