ग़ज़ल
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलींउदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं
फक्त तुमको ही नहीं रंज-ए-चाक दमानीजो सच कहें तो दरीदा लिबास हम भी हैं
तुम्हारे बाम की शम्में भी तब्नक नहींमेरे फलक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं
तुम्हें तुम्हारे आइना खाने की ज़न्गालूदामेरे सुराही और सागर गर्द गर्द से हैं
न तुमको अपने खादों खाल ही नज़र आयेंन मैं यह देख सकूं जाम में भरा क्या है
बशारतों पे वोह जले पड़े की दोनों कोसमझ में कुछ नहीं आता की माज़रा क्या है
न सर में व्हो गरूर-ए-कसीदा कामती हैन कुम्रियों की उदासी में कुछ कमी आई
न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाबन शाख-ए-अमन लिए फाख्ता कोई आई
आलम तो यह है की दोनों के मर्ज़ारों सेहवा-ए-फितना-ओ-बू-ए-फसाद आती है
सितम तो यह है की दोनों को वहम है की बहारउदूक-ए-खून में नहाने के बाद आती है
सो यह माल हुआ की इस दरिंदगी का कीअब तुम्हरे हाथ सलामत रहे न हाथ मेरे
करें तो किस से करें अपनी लग्ज़िसों का गिलान कोई साथ तुम्हरे न कोई साथ मेरे
तुम्हें भी जिद है की मास्क-ए-सितम रहे जारीहमें भी नाज़ की जारो जाफा के आदि हैं
तुम्हें भी जोम महाभारत लड़ी तुमनेहमें भी फख्र की हम कर्बला के आदि हैं
तुम्हरे हमारे शहरों की मजबूर बनवा मखलूकदबी हुई हैं दुखों के हजार्ड हेरों में
अब इनकी तीर-ए-नाशी भी चिराग चाहती हैजो लोग उन्नीस सदी तक रहे अंधेरों में
चिराग जिन से मोहब्बत को रौशनी फैलेचिराग जिन से दिए बेशुमार रोशन हों
तुम्हारे देश में आया हूँ दोस्तोंअब के न साज़-ओ-नगमों की महफ़िल न शायरी के लिए
अगर तुम्हरी ही आन का है सवालतो चलो मैं हाथ बढ़ता हूँ दोस्ती के लिए
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