ग़ज़ल

क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं

अहमद फ़राज़ · सब कलाम देखें
क्यूँ तबीयत कहीं ठहरती नहींदोस्ती तो उदास करती नहीं
हम हमेशा के सैर-चश्म सहीतुझ को देखें तो आँख भरती नहीं
शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरहकट तो जाती है पर गुज़रती नहीं
ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन!इतनी आसानियों से मरती नहीं
जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh