ग़ज़ल
आँख से दूर न हो
आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगावक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा
इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनीतू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगेऔर वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा
किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ न दोमरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा
ज़िन्दगी तेरी अता है तो ये जानेवालातेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा
डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँमैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"ज़ालिम अब के भी न रोयेगा तो मर जाएगा
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