ग़ज़ल
क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगे
क़ुर्बतों में भी जुदाई के ज़माने माँगेदिल वो बेमेह्र कि रोने के बहाने माँगे
अपना ये हाल के जी हार चुके लुट भी चुकेऔर मुहब्बत वही अन्दाज़ पुराने माँगे
यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिएअब यही तर्के-तल्लुक़ के बहाने माँगे
हम न होते तो किसी और के चर्चे होतेखल्क़त-ए-शहर तो कहने को फ़साने माँगे
ज़िन्दगी हम तेरे दाग़ों से रहे शर्मिन्दाऔर तू है कि सदा आइनेख़ानेमाँगे
दिल किसी हाल पे क़ाने ही नहीं जान-ए-"फ़राज़"मिल गये तुम भी तो क्या और न जाने माँगे
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