ग़ज़ल

अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन

अहमद फ़राज़ · सब कलाम देखें
अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौनज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन
देखना सब रक़्स-ए-बिस्मल में मगन हो जाएँगेजिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन
वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की हैलोग तो फल-फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन
हम चिराग़-ए-शब ही जब ठहरे तो फिर क्या सोचनारात थी किस का मुक़द्दर और सहर देखेगा कौन
आ फ़सील-ए-शहर से देखें ग़नीम-ए-शहर कोशहर जलता हो तो तुझ को बाम पर देखेगा कौन
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh