ग़ज़ल
अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँ
अब के तज्दीद-ए-वफ़ा का नहीं इम्काँ जानाँयाद क्या तुझ को दिलाएँ तेरा पैमाँ जानाँ
यूँ ही मौसम की अदा देख के याद आया हैकिस क़दर जल्द बदल जाते हैं इन्साँ जानाँ
ज़िन्दगी तेरी अता थी सो तेरे नाम की हैहम ने जैसे भी बसर की तेरा एहसाँ जानाँ
दिल ये कहता है कि शायद हो फ़सुर्दा तू भीदिल की क्या बात करें दिल तो है नादाँ जानाँ
अव्वल-अव्वल की मुहब्बत के नशे याद तो करबे-पिये भी तेरा चेहरा था गुलिस्ताँ जानाँ
आख़िर आख़िर तो ये आलम है कि अब होश नहींरग-ए-मीना सुलग उठी कि रग-ए-जाँ जानाँ
मुद्दतों से ये आलम न तवक़्क़ो न उम्मीददिल पुकारे ही चला जाता है जानाँ जानाँ
हम भी क्या सादा थे हम ने भी समझ रखा थाग़म-ए-दौराँ से जुदा है ग़म-ए-जानाँ जानाँ
अब की कुछ ऐसी सजी महफ़िल-ए-याराँ जानाँसर-ब-ज़ानू है कोई सर-ब-गिरेबाँ जानाँ
हर कोई अपनी ही आवाज़ से काँप उठता हैहर कोई अपने ही साये से हिरासाँ जानाँ
जिस को देखो वही ज़न्जीर-ब-पा लगता हैशहर का शहर हुआ दाख़िल-ए-ज़िन्दाँ जानाँ
अब तेरा ज़िक्र भी शायद ही ग़ज़ल में आयेऔर से और हुआ दर्द का उन्वाँ जानाँ
हम कि रूठी हुई रुत को भी मना लेते थेहम ने देखा ही न था मौसम-ए-हिज्राँ जानाँ
होश आया तो सभी ख़्वाब थे रेज़ा-रेज़ाजैसे उड़ते हुये औराक़-ए-परेशाँ जानाँ
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